सर्वनाश शुरू हो गया है

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन में पहला हादसा हुआ। पीली लाइन का प्लेटफ़ॉर्म खचाखच भरा था। एक आदमी, जिसने सफ़ेद कुर्ता पहना था, अचानक अपने बगल वाली औरत की गर्दन पर झुक गया। लोगों ने सोचा बेहोश हो गया, शायद लू लग गई। CISF का एक जवान दौड़ा, लेकिन जब तक वो पहुँचा, चार और लोग ज़मीन पर गिर चुके थे, उनके शरीर में अजीब सी ऐंठन थी। जवान ने वॉकी टॉकी उठाई। जवाब आने से पहले, प्लेटफ़ॉर्म पर चीखें गूँज उठीं।

मेट्रो के गेट से भागते लोग कनॉट प्लेस की गोल मार्केट में फैल गए। वहाँ बाहर बैठे लोग अपनी शाम की चाय पी रहे थे। किसी ने कैमरा निकाला। एक वीडियो वायरल हुआ, दस सेकंड का, जिसमें केवेंटर्स की दुकान के सामने एक औरत को तीन लोग घसीट रहे थे, और उसकी चप्पल पलक्का बाज़ार की तरफ़ उड़ती दिखी। कैप्शन था, दिल्ली में आज कुछ ज़्यादा ही भीड़ है। सात मिनट में बीस लाख व्यूज़। लोग हँस रहे थे। वो लोग जो वीडियो में थे, वो अब हँस नहीं रहे थे।

शाम 6 बजकर 47 मिनट पर गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने नॉर्थ ब्लॉक से एक बयान पढ़ा। कुछ असामाजिक तत्वों ने उपद्रव किया है, स्थिति नियंत्रण में है। शाम 7 बजकर 15 मिनट पर नॉर्थ ब्लॉक की बत्तियाँ बुझ गईं। रात 8 बजकर 2 मिनट पर 100 नंबर पर कोई नहीं उठा रहा था। दिल्ली पुलिस का ट्विटर हैंडल अभी भी सुबह के ट्रैफ़िक अपडेट पर अटका हुआ था।

दिल्ली को काटना नामुमकिन है। एक करोड़ साठ लाख लोग, रिंग रोड जो शहर को लपेटती है, बारह मेट्रो लाइनें जो हर कोने को जोड़ती हैं, और सैकड़ों गलियाँ जो किसी नक़्शे पर नहीं हैं। अगर आप ITO पर बैरिकेड लगाते हैं तो लोग प्रगति मैदान के नीचे से निकल जाएँगे। अगर आप AIIMS सील करते हैं तो सफ़दरजंग की तरफ़ से लहर आ जाएगी। दिल्ली में कोई दीवार काम नहीं करती। यह शहर दीवारें तोड़ने के लिए बना है।

चाँदनी चौक पहले गिरा। पुरानी दिल्ली की तंग गलियाँ जहाँ दो लोग मुश्किल से कंधे से कंधा मिलाकर चल सकते हैं, वहाँ भगदड़ का कोई रास्ता नहीं था। परांठे वाली गली के दुकानदारों ने कड़ाही उठाकर लड़ाई की। गरम तेल फेंका। कुछ देर काम किया। फिर और आ गए। जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर लोग ऊपर चढ़ते गए, लेकिन मीनार में जगह सीमित थी, और नीचे से आने वालों की भूख असीमित।

साउथ दिल्ली में हौज़ खास विलेज के कैफ़े मालिकों ने दरवाज़े बंद कर लिए। शीशे की दीवारों के पीछे बैठकर उन्होंने अपनी ऑर्गेनिक वाइन पी। उन्हें लगा वो सुरक्षित हैं। शीशा ज़्यादा देर नहीं टिका। ग्रेटर कैलाश के बंगलों में अलार्म बजते रहे, लेकिन सिक्योरिटी गार्ड पहले ही भाग चुके थे। वसंत कुंज के मॉल में लोग एस्केलेटर पर ऊपर भागे, लेकिन एस्केलेटर के ऊपर भी वही चीज़ खड़ी थी जिससे वो भाग रहे थे।

AIIMS के बाहर सबसे लंबी लाइन लगी। मरीज़, तीमारदार, डॉक्टर, सब एक साथ। इमरजेंसी वार्ड में कोई फ़र्क़ नहीं रह गया था कि कौन इलाज करा रहा है और कौन काट रहा है। सफ़दरजंग रोड पर एंबुलेंस की लाइन लगी थी, लेकिन कोई एंबुलेंस कहीं नहीं जा रही थी। सायरन बज रहे थे। बस सायरन।

लोधी गार्डन में शाम की सैर करने वाले अंकल-आंटी ने पहले सोचा कि कोई मैराथन हो रही है। इतने लोग एक साथ भाग रहे थे। फिर उन्होंने देखा कि भागने वालों के पीछे जो लोग हैं, वो भाग नहीं रहे। वो घिसट रहे हैं। मुग़ल काल के मक़बरों के बीच, जहाँ सदियों से मुर्दे सोए थे, अब नए मुर्दे चल रहे थे।

इंडिया गेट अभी भी जगमगा रहा था। अमर जवान ज्योति की लौ अभी भी जल रही थी। राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहते हैं, पर कोई कर्तव्य निभाने वाला नहीं बचा था। राष्ट्रपति भवन की रोशनी बुझ चुकी थी। रायसीना हिल पर अँधेरा था।

दिल्ली की आख़िरी आवाज़ लाल क़िले से आई। किसी ने म्यूज़ियम का स्पीकर चालू कर दिया था, और लाइट एंड साउंड शो अपने आप बज रहा था। सम्राटों की कहानी सुना रहा था खाली अँधेरे को।

फिर वो भी बंद हो गया।

दिल्ली चुप थी। दो करोड़ मुँह खुले हुए थे। काटने के लिए।

7 भूमिकाएँ। 28 दिन। शून्य गलती की गुंजाइश।

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